दिल्ली के जंतर-मंतर पर पिछले 20 दिनों से भूख हड़ताल पर बैठे सोनम वांगचुक को आज सुबह दिल्ली पुलिस उठाकर अस्पताल ले गई। वांगचुक कॉकरोच जनता पार्टी के प्रदर्शन में शामिल थे। प्रदर्शनकारी परीक्षा प्रणाली में सुधार और पेपर लीक की घटनाओं को लेकर केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं। सोनम पिछले तीन दशक से अधिक समय से शिक्षा, पर्यावरण और लद्दाख के अधिकारों के लिए काम करते रहे हैं।
ऐसे में सवाल उठता है कि सोनम वांगचुक कौन हैं? कब-कब और किन वजहों से चर्चा में आए? उन्हें किन कार्यों के लिए जाना जाता है? इस अनशन से पहले कौन से आंदोलन कर चुके हैं? उनके नाम के साथ 3 इडियट्स फिल्म की चर्चा क्यों होती है? आइये जानते हैं…
कौन हैं सोनम वांगचुक?
सोनम वांगचुक का जन्म 1966 में लद्दाख के लेह जिले के नदी किनारे बसे गांव उलेयटोकपो में हुआ था। उस समय उनके गांव में कोई स्कूल नहीं था, इसलिए उनकी शुरुआती पढ़ाई उनकी मां ने घर पर ही कराई। बाद में उन्होंने तत्कालीन रीजनल इंजीनियरिंग कॉलेज, श्रीनगर (अब नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी-एनआईटी श्रीनगर) से मैकेनिकल इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की।

इंजीनियरिंग पूरी करने के बाद वांगचुक ने नौकरी करने के बजाय लद्दाख की शिक्षा व्यवस्था में सुधार के लिए काम शुरू किया और 1988 में स्टूडेंट्स एजुकेशनल एंड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख (SECMOL) की स्थापना की। उस समय लद्दाख के सरकारी स्कूलों की स्थिति बेहद खराब थी। लगभग 95 प्रतिशत छात्र सरकारी परीक्षाओं में असफल हो जाते थे। वांगचुक ने इन छात्रों को पढ़ाना शुरू किया, लेकिन जल्द ही उन्हें एहसास हुआ कि केवल कोचिंग से समस्या हल नहीं होगी। इसलिए उन्होंने पूरी शिक्षा व्यवस्था में सुधार का अभियान शुरू किया।
सोनम को किन कार्यक्रमों ने बदली तस्वीर?
रेमन मैग्सेसे की वेबसाइट के अनुसार, 1994 में सोनम वांगचुक के नेतृत्व में ऑपरेशन न्यू होप शुरू किया गया। यह सरकार, गांवों और नागरिक समाज की साझेदारी वाला शिक्षा सुधार कार्यक्रम था।
इस कार्यक्रम के तहत;
- गांवों में शिक्षा समितियां बनाई गईं।
- शिक्षकों को बच्चों के अनुकूल और गतिविधि आधारित शिक्षा का प्रशिक्षण दिया गया।
- लद्दाख की स्थानीय परिस्थितियों और संस्कृति के अनुसार नई किताबें तैयार की गईं।
- अंग्रेजी शिक्षा को बढ़ावा दिया गया और स्थानीय भाषा लद्दाखी को भी महत्व मिला।
- गांव के लोगों को स्कूलों की जिम्मेदारी में भागीदार बनाया गया।
- इस मॉडल को पहले एक गांव में लागू किया गया, फिर 33 स्कूलों तक विस्तार मिला।
- इसका असर भी दिखा। 1996 में जहां सरकारी परीक्षाओं में केवल पांच प्रतिशत छात्र सफल होते थे, वहीं 2015 तक सफलता दर बढ़कर 75 प्रतिशत पहुंच गई।
- इस दौरान लगभग 700 शिक्षकों और 1,000 से अधिक गांव शिक्षा समिति के सदस्यों को प्रशिक्षण दिया गया।
फेल छात्रों के लिए बनाया अलग स्कूल
द नोबेल प्राइज की वेबसाइट के मुताबिक, सोनम वांगचुक ने उन छात्रों के लिए एसईसीएमओएल अल्टरनेटिव स्कूल की स्थापना की जो सरकारी परीक्षाओं में असफल हो चुके थे। इस स्कूल की सबसे खास बात यह है कि यहां प्रवेश के लिए अच्छे अंक नहीं, बल्कि परीक्षा में असफल होना ही पात्रता है। यहां छात्रों को सिर्फ पढ़ाई ही नहीं बल्कि जीवन कौशल, नेतृत्व, उद्यमिता और सौर ऊर्जा जैसी तकनीकों का प्रशिक्षण भी दिया जाता है।
वांगचुक ने छात्रों के साथ मिलकर मिट्टी और स्थानीय सामग्री से ऐसे सौर ऊर्जा आधारित भवन बनाए जो बाहर का तापमान -15 डिग्री सेल्सियस होने पर भी अंदर लगभग 15 डिग्री सेल्सियस बनाए रखते हैं। 2005 में सोनम वांगचुक को मानव संसाधन विकास मंत्रालय की प्राथमिक शिक्षा से जुड़ी नेशनल गवर्निंग काउंसिल का सदस्य नियुक्त किया गया।




























