केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव को वाट्सएप, फेसबुक, इंस्टाग्राम संचालित करने वाली कंपनी मेटा के प्रमुख मार्क जुकरबर्ग की इस गलतबयानी का खंडन करने के लिए जिस तरह आगे आना पड़ा कि 2024 में हुए चुनावों में भारत सहित कई देशों की सरकारें पराजित हो गईं, उससे यही पता चलता है कि सूचनाओं के सबसे बड़े प्लेटफार्म के संचालक ही किस तरह गलत जानकारियों से लैस हैं।

उन्होंने फैक्ट चेक सिस्टम को खत्म कर कम्युनिटी नोट वाली व्यवस्था अपनाई है, लेकिन इसमें गलत सूचनाओं को पहचानने की जिम्मेदारी उपयोगकर्ताओं पर ही होती है। आज फर्जी खबरें, संदर्भ से काटे गए वीडियो और मनगढ़ंत आंकड़े पूरे विश्व के लिए समस्या बन गए हैं। फर्जी और अधकचरी खबरें न केवल वैमनस्य फैला रही हैं, बल्कि लोगों की राय प्रभावित करने और चुनावों पर असर डालने का भी काम कर रही हैं।
फर्जी खबरों के चलते कई देशों में दंगे और बड़े पैमाने पर हिंसा हो चुकी है। इस तथ्य से किसी भी सोशल नेटवर्क साइट्स के संचालक और खासकर मार्क जुकरबर्ग तो बिल्कुल भी अपरिचित नहीं हो सकते, क्योंकि कई बार यह सामने आ चुका है कि वाट्सएप और फेसबुक के जरिये फैलाई गईं फर्जी खबरें किस तरह हिंसा का कारण बनीं।

इसके बाद भी यदि मार्क जुकरबर्ग ने अमेरिका में फर्जी खबरों की पहचान करने वाली व्यवस्था खत्म कर दी तो यह साफ है कि वह निर्वाचित अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के दबाव में आ गए। मार्क जुकरबर्ग का ट्रंप से झगड़ा किसी से छिपा नहीं है। वह फर्जी खबरें फैलाने का आरोप लगाकर उन्हें फेसबुक पर प्रतिबंधित कर चुके हैं।
यह समझ आता है कि वह ट्रंप के दबाव का सामना करने की स्थिति में नहीं, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि वह फर्जी खबरें फैलाने वालों को छूट दे दें। यह ठीक है कि मार्क जुकरबर्ग ने अभी केवल अमेरिका में फर्जी खबरों की पहचान की प्रक्रिया खत्म की है, लेकिन आशंका यही है कि आगे चलकर वह दुनिया भर में ऐसा कर सकते हैं।
यह एक तरह से जानबूझकर फर्जी खबरों को बढ़ावा देने जैसा होगा और इसके नतीजे अच्छे नहीं होंगे। भारत को ऐसा नहीं होने देना चाहिए। उसे ऐसा कुछ करना होगा, जिससे सोशल मीडिया कंपनियां फर्जी खबरों के प्रचार-प्रसार पर लगाम लगाने की अपनी जवाबदेही से बचने न पाएं।





























